श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।

तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥ १०

yadā bhajati māṃ bhaktyā nirapekṣaḥ svakarmabhiḥ|

taṃ sattvaprakṛtiṃ vidyāt puruṣaṃ striyameva vā|| 10

अर्थ

पुरुष हो, चाहे स्त्री—जब वह निष्काम होकर अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंद्वारा मेरी आराधना करे, तब उसे सत्त्वगुणी जानना चाहिये॥ १०॥

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