यह मनुष्यशरीर बहुत ही दुर्लभ है। इसी शरीरमें तत्त्वज्ञान और उसमें निष्ठारूप विज्ञानकी प्राप्ति सम्भव है; इसलिये इसे पाकर बुद्धिमान् पुरुषोंको गुणोंकी आसक्ति हटाकर मेरा भजन करना चाहिये॥ ३३॥
तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम्।
गुणसंगं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः॥ ३३
यह मनुष्यशरीर बहुत ही दुर्लभ है। इसी शरीरमें तत्त्वज्ञान और उसमें निष्ठारूप विज्ञानकी प्राप्ति सम्भव है; इसलिये इसे पाकर बुद्धिमान् पुरुषोंको गुणोंकी आसक्ति हटाकर मेरा भजन करना चाहिये॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.25.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 870) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/33/