श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।

शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा॥ ३१

yathopaśrayamāṇasya bhagavantaṃ vibhāvasum|

śītaṃ bhayaṃ tamo'pyeti sādhūn saṃsevatastathā|| 31

अर्थ

उनकी तो बात ही क्या—जिसने उन संत पुरुषोंकी शरण ग्रहण कर ली उसकी भी कर्मजडता, संसारभय और अज्ञान आदि सर्वथा निवृत्त हो जाते हैं। भला, जिसने अग्‍निभगवान्‌का आश्रय ले लिया उसे शीत, भय अथवा अन्धकारका दुःख हो सकता है?॥ ३१॥

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