श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अन्‍नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम्।

धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् बिभ्यतोऽरणम्॥ ३३✎ 1231

annaṃ hi prāṇināṃ prāṇa ārtānāṃ śaraṇaṃ tvaham|

dharmo vittaṃ nṛṇāṃ pretya santo'rvāg bibhyato'raṇam|| 33

अर्थ

जैसे अन्‍नसे प्राणियोंके प्राणकी रक्षा होती है, जैसे मैं ही दीन-दुखियोंका परम रक्षक हूँ, जैसे मनुष्यके लिये परलोकमें धर्म ही एकमात्र पूँजी है—वैसे ही जो लोग संसारसे भयभीत हैं, उनके लिये संतजन ही परम आश्रय हैं॥ ३३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1231 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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