॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.26.33
अन्नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम्।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग् बिभ्यतोऽरणम्॥ ३३✎ 1231
annaṃ hi prāṇināṃ prāṇa ārtānāṃ śaraṇaṃ tvaham|
dharmo vittaṃ nṛṇāṃ pretya santo'rvāg bibhyato'raṇam|| 33
अर्थ
जैसे अन्नसे प्राणियोंके प्राणकी रक्षा होती है, जैसे मैं ही दीन-दुखियोंका परम रक्षक हूँ, जैसे मनुष्यके लिये परलोकमें धर्म ही एकमात्र पूँजी है—वैसे ही जो लोग संसारसे भयभीत हैं, उनके लिये संतजन ही परम आश्रय हैं॥ ३३॥