asthirāyāṃ vikalpaḥ syāt sthaṇḍile tu bhaved dvayam|
snapanaṃ tvavilepyāyāmanyatra parimārjanam|| 14
अर्थ
चल प्रतिमाके सम्बन्धमें विकल्प है। चाहे करे और चाहे न करे। परन्तु बालुकामयी प्रतिमामें तो आवाहन और विसर्जन प्रतिदिन करना ही चाहिये। मिट्टी और चन्दनकी तथा चित्रमयी प्रतिमाओंको स्नान न करावे, केवल मार्जन कर दे; परन्तु और सबको स्नान कराना चाहिये॥ १४॥
अस्थिरायां विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम्।
स्नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्॥ १४
चल प्रतिमाके सम्बन्धमें विकल्प है। चाहे करे और चाहे न करे। परन्तु बालुकामयी प्रतिमामें तो आवाहन और विसर्जन प्रतिदिन करना ही चाहिये। मिट्टी और चन्दनकी तथा चित्रमयी प्रतिमाओंको स्नान न करावे, केवल मार्जन कर दे; परन्तु और सबको स्नान कराना चाहिये॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 877) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/27/14/