श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम्।

उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये॥ २६

padmamaṣṭadalaṃ tatra karṇikākesarojjvalam|

ubhābhyāṃ vedatantrābhyāṃ mahyaṃ tūbhayasiddhaye|| 26

अर्थ

उद्धवजी! मेरे आसनमें धर्म आदि गुणों और विमला आदि शक्तियोंकी भावना करे। अर्थात् आसनके चारों कोनोंमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्‍वर्यरूप चार पाये हैं; अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्‍वर्य—ये चार चारों दिशाओंमें डंडे हैं; सत्त्व-रज-तम-रूप तीन पटरियोंकी बनी हुई पीठ है; उसपर विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा—ये नौ शक्तियाँ विराजमान हैं। उस आसनपर एक अष्टदल कमल है, उसकी कर्णिका अत्यन्त प्रकाशमान है और पीली-पीली केसरोंकी छटा निराली ही है। आसनके सम्बन्धमें ऐसी भावना करके पाद्य, आचमनीय और अर्घ्य आदि उपचार प्रस्तुत करे। तदनन्तर भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये वैदिक और तान्त्रिक विधिसे मेरी पूजा करे॥ २५-२६॥✎ 1766 1767

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1766 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जीव-कलाका → जीवकलाका
  • #1767 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्राण-वायु → प्राणवायु

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