श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून् सुरान्।

स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभिः॥ २९

durgāṃ vināyakaṃ vyāsaṃ viṣvaksenaṃ gurūn surān|

sve sve sthāne tvabhimukhān pūjayet prokṣaṇādibhiḥ|| 29

अर्थ

नन्द, सुनन्द, प्रचण्ड, चण्ड, महाबल, बल, कुमुद और कुमुदेक्षण—इन आठ पार्षदोंकी आठ दिशाओंमें; गरुड़की सामने; दुर्गा, विनायक, व्यास और विष्वक्सेनकी चारों कोनोंमें स्थापना करके पूजन करे। बायीं ओर गुरुकी और यथाक्रम पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि आठ लोकपालोंकी स्थापना करके प्रोक्षण, अर्घ्यदान आदि क्रमसे उनकी पूजा करनी चाहिये॥ २८-२९॥✎ 1768

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1768 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वैजयन्ती-माला → वैजयन्तीमाला

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