श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्।

संयावदधिसूपांश्‍च नैवेद्यं सति कल्पयेत्॥ ३४

guḍapāyasasarpīṃṣi śaṣkulyāpūpamodakān|

saṃyāvadadhisūpāṃśca naivedyaṃ sati kalpayet|| 34

अर्थ

यदि हो सके तो गुड़, खीर, घृत, पूड़ी, पूए, लड्डू, हलुआ, दही और दाल आदि विविध व्यंजनोंका नैवेद्य लगावे॥ ३४॥

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