श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत्।

सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थितः॥ ४८

arcādiṣu yadā yatra śraddhā māṃ tatra cārcayet|

sarvabhūteṣvātmani ca sarvātmāhamavasthitaḥ|| 48

अर्थ

उद्धवजी! प्रतिमा आदिमें जब जहाँ श्रद्धा हो तब, तहाँ मेरी पूजा करनी चाहिये, क्योंकि मैं सर्वात्मा हूँ और समस्त प्राणियोंमें तथा अपने हृदयमें भी स्थित हूँ॥ ४८॥

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