श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो

जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः।

सूत्रं महानित्युरुधेव गीतः

संसार आधावति कालतन्त्रः॥ १६

dehendriyaprāṇamano'bhimāno

jīvo'ntarātmā guṇakarmamūrtiḥ|

sūtraṃ mahānityurudheva gītaḥ

saṃsāra ādhāvati kālatantraḥ|| 16

अर्थ

उद्धवजी! देह, इन्द्रिय, प्राण और मनमें स्थित आत्मा ही जब उनका अभिमान कर बैठता है—उन्हें अपना स्वरूप मान लेता है—तब उसका नाम ‘जीव’ हो जाता है। उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म आत्माकी मूर्ति है—गुण और कर्मोंका बना हुआ लिंगशरीर। उसे ही कहीं सूत्रात्मा कहा जाता है और कहीं महत्तत्त्व। उसके और भी बहुत-से नाम हैं। वही कालरूप परमेश्‍वरके अधीन होकर जन्म-मृत्युरूप संसारमें इधर-उधर भटकता रहता है॥ १६॥

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