श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अविद्यमानोऽप्यवभासते यो

वैकारिको राजससर्ग एषः।

ब्रह्म स्वयंज्योतिरतो विभाति

ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २२

avidyamāno'pyavabhāsate yo

vaikāriko rājasasarga eṣaḥ|

brahma svayaṃjyotirato vibhāti

brahmendriyārthātmavikāracitram || 22

अर्थ

यह जो विकारमयी राजस सृष्टि है, यह न होनेपर भी दीख रही है। यह स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही है। इसलिये इन्द्रिय, विषय, मन और पञ्चभूतादि जितने चित्र-विचित्र नामरूप हैं उनके रूपमें ब्रह्म ही प्रतीत हो रहा है॥ २२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें