श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कुयोगिनो ये विहितान्तरायै-

र्मनुष्यभूतैस्त्रिदशोपसृष्टैः ।

ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयो

युञ्जन्ति योगं न तु कर्मतन्त्रम्॥ २९

kuyogino ye vihitāntarāyai-

rmanuṣyabhūtaistridaśopasṛṣṭaiḥ |

te prāktanābhyāsabalena bhūyo

yuñjanti yogaṃ na tu karmatantram|| 29

अर्थ

देवताओंके द्वारा प्रेरित शिष्य-पुत्र आदिके द्वारा किये हुए विघ्नोंसे यदि कदाचित् अधूरा योगी मार्गच्युत हो जाय तो भी वह अपने पूर्वाभ्यासके कारण पुनः योगाभ्यासमें ही लग जाता है। कर्म आदिमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होती॥ २९॥

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