श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो

महानुभूतिः सकलानुभूतिः।

एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे

येनेषिता वागसवश्‍चरन्ति॥ ३५

eṣa svayaṃjyotirajo'prameyo

mahānubhūtiḥ sakalānubhūtiḥ|

eko'dvitīyo vacasāṃ virāme

yeneṣitā vāgasavaścaranti|| 35

अर्थ

उद्धवजी! आत्मा नित्य अपरोक्ष है, उसकी प्राप्ति नहीं करनी पड़ती। वह स्वयंप्रकाश है। उसमें अज्ञान आदि किसी प्रकारके विकार नहीं हैं। वह जन्मरहित है अर्थात् कभी किसी प्रकार भी वृत्तिमें आरूढ़ नहीं होता। इसलिये अप्रमेय है। ज्ञान आदिके द्वारा उसका संस्कार भी नहीं किया जा सकता। आत्मामें देश, काल और वस्तुकृत परिच्छेद न होनेके कारण अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, ह्रास और विनाश उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते। सबकी और सब प्रकारकी अनुभूतियाँ आत्मस्वरूप ही हैं। जब मन और वाणी आत्माको अपना अविषय समझकर निवृत्त हो जाते हैं, तब वही सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदसे शून्य एक अद्वितीय रह जाता है। व्यवहारदृष्टिसे उसके स्वरूपका वाणी और प्राण आदिके प्रवर्तकके रूपमें निरूपण किया जाता है॥ ३५॥✎ 1452

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1452 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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