श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.28.41

एकादश स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

केचिद् देहमिमं धीराः सुकल्पं वयसि स्थिरम्।

विधाय विविधोपायैरथ युंजन्ति सिद्धये॥ ४१

kecid dehamimaṃ dhīrāḥ sukalpaṃ vayasi sthiram|

vidhāya vividhopāyairatha yuṃjanti siddhaye|| 41

अर्थ

कोई-कोई मनस्वी योगी विविध उपायोंके द्वारा इस शरीरको सुदृढ़ और युवावस्थामें स्थिर करके फिर अणिमा आदि सिद्धियोंके लिये योगसाधन करते हैं, परन्तु बुद्धिमान् पुरुष ऐसे विचारका समर्थन नहीं करते, क्योंकि यह तो एक व्यर्थ प्रयास है। वृक्षमें लगे हुए फलके समान इस शरीरका नाश तो अवश्यम्भावी है॥ ४१-४२॥

यह अर्थ श्लोक 41–42 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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