शुद्धान्तःकरण पुरुष आकाशके समान बाहर और भीतर परिपूर्ण एवं आवरणशून्य मुझ परमात्माको ही समस्त प्राणियों और अपने हृदयमें स्थित देखे॥ १२॥✎ 2001
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम्।
ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशयः॥ १२
शुद्धान्तःकरण पुरुष आकाशके समान बाहर और भीतर परिपूर्ण एवं आवरणशून्य मुझ परमात्माको ही समस्त प्राणियों और अपने हृदयमें स्थित देखे॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 892) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/29/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-