जबतक समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना—भगवद्भावना न होने लगे, तबतक इस प्रकारसे मन, वाणी और शरीरके सभी संकल्पों और कर्मोंद्वारा मेरी उपासना करता रहे॥ १७॥✎ 2001
यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।
तावदेवमुपासीत वाङ्मनःकायवृत्तिभिः॥ १७
जबतक समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना—भगवद्भावना न होने लगे, तबतक इस प्रकारसे मन, वाणी और शरीरके सभी संकल्पों और कर्मोंद्वारा मेरी उपासना करता रहे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 893) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/29/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-