विवेकियोंके विवेक और चतुरोंकी चतुराईकी पराकाष्ठा इसीमें है कि वे इस विनाशी और असत्य शरीरके द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्य तत्त्वको प्राप्त कर लें॥ २२॥✎ 2001
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥ २२
विवेकियोंके विवेक और चतुरोंकी चतुराईकी पराकाष्ठा इसीमें है कि वे इस विनाशी और असत्य शरीरके द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्य तत्त्वको प्राप्त कर लें॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 893) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/29/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#2001 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-