mayi bhaktiṃ parāṃ kurvan karmabhirna sa badhyate|| 28
अर्थ
जो कोई एकाग्र चित्तसे इसे श्रद्धापूर्वक नित्य सुनेगा, उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होगी और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ २८॥
य एतच्छ्रद्धया नित्यमव्यग्रः शृणुयान्नरः।
मयि भक्तिं परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यते॥ २८
जो कोई एकाग्र चित्तसे इसे श्रद्धापूर्वक नित्य सुनेगा, उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होगी और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.29.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 894) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/29/28/