श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च।

अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम्॥ ३०

naitattvayā dāmbhikāya nāstikāya śaṭhāya ca|

aśuśrūṣorabhaktāya durvinītāya dīyatām|| 30

अर्थ

तुम इसे दाम्भिक, नास्तिक, शठ, अश्रद्धालु, भक्तिहीन और उद्धत पुरुषको कभी मत देना॥ ३०॥

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