॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.29.38
प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिना
भृत्याय विज्ञानमयः प्रदीपः।
हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलं
कोऽन्यत् समीयाच्छरणं त्वदीयम्॥ ३८
pratyarpito me bhavatānukampinā
bhṛtyāya vijñānamayaḥ pradīpaḥ|
hitvā kṛtajñastava pādamūlaṃ
ko'nyat samīyāccharaṇaṃ tvadīyam|| 38
अर्थ
भगवन्! आपकी मोहिनी मायाने मेरा ज्ञानदीपक छीन लिया था, परन्तु आपने कृपा करके वह फिर अपने सेवकको लौटा दिया। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रहकी वर्षा की है। ऐसा कौन होगा, जो आपके इस कृपा-प्रसादका अनुभव करके भी आपके चरणकमलोंकी शरण छोड़ दे और किसी दूसरेका सहारा ले?॥ ३८॥✎ 906