श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

किं चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धो

दासेष्वनन्यशरणेषु यदात्मसात्त्वम्।

योऽरोचयत् सह मृगैः स्वयमीश्‍वराणां

श्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठः ॥ ४

kiṃ citramacyuta tavaitadaśeṣabandho

dāseṣvananyaśaraṇeṣu yadātmasāttvam|

yo'rocayat saha mṛgaiḥ svayamīśvarāṇāṃ

śrīmatkirīṭataṭapīḍitapādapīṭhaḥ || 4

अर्थ

प्रभो! आप सबके हितैषी सुहृद् हैं। आप अपने अनन्य शरणागत बलि आदि सेवकोंके अधीन हो जायँ, यह आपके लिये कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आपने रामावतार ग्रहण करके प्रेमवश वानरोंसे भी मित्रताका निर्वाह किया। यद्यपि ब्रह्मा आदि लोकेश्‍वरगण भी अपने दिव्य किरीटोंको आपके चरणकमल रखनेकी चौकीपर रगड़ते रहते हैं॥ ४॥

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