श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशीलः संयतेन्द्रियः।

शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुतः॥ ४३

titikṣurdvandvamātrāṇāṃ suśīlaḥ saṃyatendriyaḥ|

śāntaḥ samāhitadhiyā jñānavijñānasaṃyutaḥ|| 43

अर्थ

सर्दी-गरमी, सुख-दुःख—जो कुछ आ पड़े, उसे सम रहकर सहना। स्वभाव सौम्य रखना, इन्द्रियोंको वशमें रखना। चित्त शान्त रहे। बुद्धि समाहित रहे और तुम स्वयं मेरे स्वरूपके ज्ञान और अनुभवमें डूबे रहना॥ ४३॥✎ 1771

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1771 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गंगा-जलका → गंगाजलका

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