श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.29.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवः

प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयोः।

शिरो निधायाश्रुकलाभिरार्द्रधी-

र्न्यषिंचदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे ॥ ४५

sa evamukto harimedhasoddhavaḥ

pradakṣiṇaṃ taṃ parisṛtya pādayoḥ|

śiro nidhāyāśrukalābhirārdradhī-

rnyaṣiṃcadadvandvaparo'pyapakrame || 45

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपका ज्ञान संसारके भेदभ्रमको छिन्‍न-भिन्‍न कर देता है। जब उन्होंने स्वयं उद्धवजीको ऐसा उपदेश किया तो उन्होंने उनकी परिक्रमा की और उनके चरणोंपर सिर रख दिया। इसमें सन्देह नहीं कि उद्धवजी संयोग-वियोगसे होनेवाले सुख-दुःखके जोड़ेसे परे थे, क्योंकि वे भगवान्‌के निर्द्वन्द्व चरणोंकी शरण ले चुके थे; फिर भी वहाँसे चलते समय उनका चित्त प्रेमावेशसे भर गया। उन्होंने अपने नेत्रोंकी झरती हुई अश्रुधारासे भगवान्‌के चरणकमलोंको भिगो दिया॥ ४५॥✎ 1772 1773

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1772 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्षीर-समुद्रसे → क्षीरसमुद्रसे
  • #1773 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: उपदेशा-नुसार → उपदेशानुसार

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