माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण
राजोवाच
परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।
मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः॥ १
parasya viṣṇorīśasya māyināmapi mohinīm|
māyāṃ veditumicchāmo bhagavanto bruvantu naḥ|| 1
अर्थ
राजा निमिने पूछा—भगवन्! सर्वशक्तिमान् परमकारण विष्णुभगवान्की माया बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; (और आप कहते हैं कि भक्त उसे देखा करता है।) अतः अब मैं उस मायाका स्वरूप जानना चाहता हूँ, आपलोग कृपा करके बतलाइये॥ १॥✎ 1726
परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।
मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः॥ १
राजा निमिने पूछा—भगवन्! सर्वशक्तिमान् परमकारण विष्णुभगवान्की माया बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; (और आप कहते हैं कि भक्त उसे देखा करता है।) अतः अब मैं उस मायाका स्वरूप जानना चाहता हूँ, आपलोग कृपा करके बतलाइये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 721) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)