॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.3.14
हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।
हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४
hṛtarūpaṃ tu tamasā vāyau jyotiḥ pralīyate|
hṛtasparśo'vakāśena vāyurnabhasi līyate|| 14
अर्थ
जब अन्धकार अग्निका रूप छीन लेता है, तब वह अग्नि वायुमें लीन हो जाती है और जब अवकाशरूप आकाश वायुकी स्पर्श-शक्ति छीन लेता है, तब वह आकाशमें लीन हो जाता है—यह भगवान्की माया है॥ १४॥