॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.3.17
राजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।
तरन्त्यंजः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७
yathaitāmaiśvarīṃ māyāṃ dustarāmakṛtātmabhiḥ|
tarantyaṃjaḥ sthūladhiyo maharṣa idamucyatām|| 17
अर्थ
राजा निमिने पूछा—महर्षिजी! इस भगवान्की मायाको पार करना उन लोगोंके लिये तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मनको वशमें नहीं कर पाये हैं। अब आप कृपा करके यह बताइये कि जो लोग शरीर आदिमें आत्मबुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ मोटी है, वे भी अनायास ही इसे कैसे पार कर सकते हैं?॥ १७॥