श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।

दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत् परस्मै निवेदनम्॥ २८

iṣṭaṃ dattaṃ tapo japtaṃ vṛttaṃ yaccātmanaḥ priyam|

dārān sutān gṛhān prāṇān yat parasmai nivedanam|| 28

अर्थ

यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचारका पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ अपनेको प्रिय लगता हो—सब-का-सब भगवान्‌के चरणोंमें निवेदन करना उन्हें सौंप देना सीखे॥ २८॥

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