इस प्रकार पंचमहाभूतोंके द्वारा बने हुए प्राणि-शरीरोंमें उन्होंने अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश किया और अपनेको ही पहले एक मनके रूपमें और इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय—इन दस रूपोंमें विभक्त कर दिया तथा उन्हींके द्वारा विषयोंका भोग कराने लगे॥ ४॥
एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पंचधातुभिः।
एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजंजुषते गुणान्॥ ४
इस प्रकार पंचमहाभूतोंके द्वारा बने हुए प्राणि-शरीरोंमें उन्होंने अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश किया और अपनेको ही पहले एक मनके रूपमें और इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय—इन दस रूपोंमें विभक्त कर दिया तथा उन्हींके द्वारा विषयोंका भोग कराने लगे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 722) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/3/4/