श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहाः पुमान्।

आभूतसम्प्लवात् सर्गप्रलयावश्‍नुतेऽवशः॥ ७

itthaṃ karmagatīrgacchan bahvabhadravahāḥ pumān|

ābhūtasamplavāt sargapralayāvaśnute'vaśaḥ|| 7

अर्थ

इस प्रकार यह जीव ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियोंको, उनके फलोंको प्राप्त होता है और महाभूतोंके प्रलयपर्यन्त विवश होकर जन्मके बाद मृत्यु और मृत्युके बाद जन्मको प्राप्त होता रहता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ७॥

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