॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.30.15
पतत्पताकै रथकुञ्जरादिभिः
खरोष्ट्रगोभिर्महिषैर्नरैरपि ।
मिथः समेत्याश्वतरैः सुदुर्मदा
न्यहञ्छरैर्दद्भिरिव द्विपा वने॥ १५
patatpatākai rathakuñjarādibhiḥ
kharoṣṭragobhirmahiṣairnarairapi |
mithaḥ sametyāśvataraiḥ sudurmadā
nyahañcharairdadbhiriva dvipā vane|| 15
अर्थ
मतवाले यदुवंशी रथों, हाथियों, घोड़ों, गधों, ऊँटों, खच्चरों, बैलों, भैंसों और मनुष्योंपर भी सवार होकर एक-दूसरेको बाणोंसे घायल करने लगे—मानो जंगली हाथी एक-दूसरेपर दाँतोंसे चोट कर रहे हों। सबकी सवारियोंपर ध्वजाएँ फहरा रही थीं, पैदल सैनिक भी आपसमें उलझ रहे थे॥ १५॥