॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.30.43
अपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभो
दृष्टिः प्रनष्टा तमसि प्रविष्टा।
दिशो न जाने न लभे च शान्तिं
यथा निशायामुडुपे प्रनष्टे॥ ४३
apaśyatastvaccaraṇāmbujaṃ prabho
dṛṣṭiḥ pranaṣṭā tamasi praviṣṭā|
diśo na jāne na labhe ca śāntiṃ
yathā niśāyāmuḍupe pranaṣṭe|| 43
अर्थ
उसने भगवान्से प्रार्थना की—‘प्रभो! रात्रिके समय चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर राह चलनेवालेकी जैसी दशा हो जाती है, आपके चरणकमलोंका दर्शन न पाकर मेरी भी वैसी ही दशा हो गयी है। मेरी दृष्टि नष्ट हो गयी है, चारों ओर अँधेरा छा गया है। अब न तो मुझे दिशाओंका ज्ञान है और न मेरे हृदयमें शान्ति ही है’॥ ४३॥✎ 907 1775