श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षकः।

मन्मायारचनामेतां विज्ञायोपशमं व्रज॥ ४९

tvaṃ tu maddharmamāsthāya jñānaniṣṭha upekṣakaḥ|

manmāyāracanāmetāṃ vijñāyopaśamaṃ vraja|| 49

अर्थ

दारुक! तुम मेरे द्वारा उपदिष्ट भागवतधर्मका आश्रय लो और ज्ञाननिष्ठ होकर सबकी उपेक्षा कर दो तथा इस दृश्यको मेरी मायाकी रचना समझकर शान्त हो जाओ’॥ ४९॥✎ 907 1775

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #907 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1775 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गरुड़-ध्वज → गरुड़ध्वज

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