श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

अथैकत्रिंशोऽध्यायः

श्रीभगवान्‌का स्वधामगमन

श्रीशुक उवाच

अथ तत्रागमद् ब्रह्मा भवान्या च समं भवः।

महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्‍वराः॥ १

atha tatrāgamad brahmā bhavānyā ca samaṃ bhavaḥ|

mahendrapramukhā devā munayaḥ saprajeśvarāḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! दारुकके चले जानेपर ब्रह्माजी, शिव-पार्वती, इन्द्रादि लोकपाल, मरीचि आदि प्रजापति, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, पितर-सिद्ध, गन्धर्व-विद्याधर, नाग-चारण, यक्ष-राक्षस, किन्‍नर-अप्सराएँ तथा गरुड़लोकके विभिन्‍न पक्षी अथवा मैत्रेय आदि ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परमधाम-प्रस्थानको देखनेके लिये बड़ी उत्सुकतासे वहाँ आये। वे सभी भगवान् श्रीकृष्णके जन्म और लीलाओंका गान अथवा वर्णन कर रहे थे। उनके विमानोंसे सारा आकाश भर-सा गया था। वे बड़ी भक्तिसे भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ १—४॥

यह अर्थ श्लोक 1–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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