श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।

विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा॥ १०

brahmarudrādayaste tu dṛṣṭvā yogagatiṃ hareḥ|

vismitāstāṃ praśaṃsantaḥ svaṃ svaṃ lokaṃ yayustadā|| 10

अर्थ

ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्‌की यह परमयोगमयी गति देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने-अपने लोकमें चले गये॥ १०॥

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