श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं

त्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम्।

जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः

किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२

martyena yo gurusutaṃ yamalokanītaṃ

tvāṃ cānayaccharaṇadaḥ paramāstradagdham|

jigye'ntakāntakamapīśamasāvanīśaḥ

kiṃ svāvane svaranayanmṛgayuṃ sadeham|| 12

अर्थ

सान्दीपनि गुरुका पुत्र यमपुरी चला गया था, परन्तु उसे वे मनुष्य-शरीरके साथ लौटा लाये। तुम्हारा ही शरीर ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था; परन्तु उन्होंने तुम्हें जीवित कर दिया। वास्तवमें उनकी शरणागतवत्सलता ऐसी ही है। और तो क्या कहूँ, उन्होंने कालोंके महाकाल भगवान् शंकरको भी युद्धमें जीत लिया और अत्यन्त अपराधी—अपने शरीरपर ही प्रहार करनेवाले व्याधको भी सदेह स्वर्ग भेज दिया। प्रिय परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें क्या वे अपने शरीरको सदाके लिये यहाँ नहीं रख सकते थे? अवश्य ही रख सकते थे॥ १२॥

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