श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां

नारायणो नर ऋषिप्रवरः प्रशान्तः।

नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म

योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्‌घ्रिः॥ ६

dharmasya dakṣaduhitaryajaniṣṭa mūrtyāṃ

nārāyaṇo nara ṛṣipravaraḥ praśāntaḥ|

naiṣkarmyalakṣaṇamuvāca cacāra karma

yo'dyāpi cāsta ṛṣivaryaniṣevitāṅghriḥ|| 6

अर्थ

दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था मूर्ति। वह धर्मकी पत्‍नी थी। उसके गर्भसे भगवान्‌ने ऋषिश्रेष्ठ शान्तात्मा ‘नर’ और ‘नारायण’ के रूपमें अवतार लिया । उन्होंने आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले उस भगवदाराधनरूप कर्मका उपदेश किया, जो वास्तवमें कर्मबन्धनसे छुड़ानेवाला और नैष्कर्म्य स्थितिको प्राप्त करानेवाला है। उन्होंने स्वयं भी वैसे ही कर्मका अनुष्ठान किया। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। वे आज भी बदरिकाश्रममें उसी कर्मका आचरण करते हुए विराजमान हैं॥ ६॥✎ 1727

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1727 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-पदको → परमपदको

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