श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः

सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः।

नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं

स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥ ९

itthaṃ bruvatyabhayade naradeva devāḥ

savrīḍanamraśirasaḥ saghṛṇaṃ tamūcuḥ|

naitad vibho tvayi pare'vikṛte vicitraṃ

svārāmadhīranikarānatapādapadme || 9

अर्थ

राजन्! जब नर-नारायण ऋषिने उन्हें अभयदान देते हुए इस प्रकार कहा, तब कामदेव आदिके सिर लज्जासे झुक गये। उन्होंने दयालु भगवान् नर-नारायणसे कहा—‘प्रभो! आपके लिये यह कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि आप मायासे परे और निर्विकार हैं। बड़े-बड़े आत्माराम और धीर पुरुष निरन्तर आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करते रहते हैं॥ ९॥✎ 1727

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1727 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-पदको → परमपदको

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