॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.5.1
अथ पञ्चमोऽध्यायः
भक्तिहीन पुरुषोंकी गति और भगवान्की पूजाविधिका वर्णन
राजोवाच
भगवन्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः।
तेषामशान्तकामानां का निष्ठाविजितात्मनाम्॥ १
bhagavantaṃ hariṃ prāyo na bhajantyātmavittamāḥ|
teṣāmaśāntakāmānāṃ kā niṣṭhāvijitātmanām|| 1
अर्थ
राजा निमिने पूछा—योगीश्वरो! आपलोग तो श्रेष्ठ आत्मज्ञानी और भगवान्के परमभक्त हैं। कृपा करके यह बतलाइये कि जिनकी कामनाएँ शान्त नहीं हुई हैं, लौकिक-पारलौकिक भोगोंकी लालसा मिटी नहीं है और मन एवं इन्द्रियाँ भी वशमें नहीं हैं तथा जो प्रायः भगवान्का भजन भी नहीं करते, ऐसे लोगोंकी क्या गति होती है?॥ १॥