श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

एत आत्महनोऽशान्ता अज्ञाने ज्ञानमानिनः।

सीदन्त्यकृतकृत्या वै कालध्वस्तमनोरथाः॥ १७

eta ātmahano'śāntā ajñāne jñānamāninaḥ|

sīdantyakṛtakṛtyā vai kāladhvastamanorathāḥ|| 17

अर्थ

अज्ञानको ही ज्ञान माननेवाले इन आत्मघातियोंको कभी शान्ति नहीं मिलती, इनके कर्मोंकी परम्परा कभी शान्त नहीं होती। कालभगवान् सदा-सर्वदा इनके मनोरथोंपर पानी फेरते रहते हैं। इनके हृदयकी जलन, विषाद कभी मिटनेका नहीं॥ १७॥✎ 902 1732 1733

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #902 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1732 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: काल-भगवान् → कालभगवान्
  • #1733 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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