श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

मनुष्यास्तु तदा शान्ता निर्वैराः सुहृदः समाः।

यजन्ति तपसा देवं शमेन च दमेन च॥ २२

manuṣyāstu tadā śāntā nirvairāḥ suhṛdaḥ samāḥ|

yajanti tapasā devaṃ śamena ca damena ca|| 22

अर्थ

सत्ययुगके मनुष्य बड़े शान्त, परस्पर वैररहित, सबके हितैषी और समदर्शी होते हैं। वे लोग इन्द्रियों और मनको वशमें रखकर ध्यानरूप तपस्याके द्वारा सबके प्रकाशक परमात्माकी आराधना करते हैं॥ २२॥

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