श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः।

यत्र संकीर्तनेनैव सर्वः स्वार्थोऽभिलभ्यते॥ ३६

kaliṃ sabhājayantyāryā guṇajñāḥ sārabhāginaḥ|

yatra saṃkīrtanenaiva sarvaḥ svārtho'bhilabhyate|| 36

अर्थ

कलियुगमें केवल संकीर्तनसे ही सारे स्वार्थ और परमार्थ बन जाते हैं। इसलिये इस युगका गुण जाननेवाले सारग्राही श्रेष्ठ पुरुष कलियुगकी बड़ी प्रशंसा करते हैं, इससे बड़ा प्रेम करते हैं॥ ३६॥✎ 1736

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1736 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कलि-युगमें → कलियुगमें

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