श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-

शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः।

ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ

तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्॥ ४८

vaireṇa yaṃ nṛpatayaḥ śiśupālapauṇḍra-

śālvādayo gativilāsavilokanādyaiḥ|

dhyāyanta ākṛtadhiyaḥ śayanāsanādau

tatsāmyamāpuranuraktadhiyāṃ punaḥ kim|| 48

अर्थ

वसुदेवजी! शिशुपाल, पौण्ड्रक और शाल्व आदि राजाओंने तो वैरभावसे श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, लीला-विलास, चितवन-बोलन आदिका स्मरण किया था। वह भी नियमानुसार नहीं, सोते, बैठते, चलते-फिरते—स्वाभाविकरूपसे ही। फिर भी उनकी चित्तवृत्ति श्रीकृष्णाकार हो गयी और वे सारूप्यमुक्तिके अधिकारी हुए। फिर जो लोग प्रेमभाव और अनुरागसे श्रीकृष्णका चिन्तन करते हैं, उन्हें श्रीकृष्णकी प्राप्ति होनेमें कोई सन्देह है क्या?॥ ४८॥

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