श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रिया विभूत्याभिजनेन विद्यया

त्यागेन रूपेण बलेन कर्मणा।

जातस्मयेनान्धधियः सहेश्‍वरान्

सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान् खलाः॥ ९

śriyā vibhūtyābhijanena vidyayā

tyāgena rūpeṇa balena karmaṇā|

jātasmayenāndhadhiyaḥ saheśvarān

sato'vamanyanti haripriyān khalāḥ|| 9

अर्थ

धन-वैभव, कुलीनता, विद्या, दान, सौन्दर्य, बल और कर्म आदिके घमंडसे अंधे हो जाते हैं तथा वे दुष्ट उन भगवत्प्रेमी संतों तथा ईश्‍वरका भी अपमान करते रहते हैं॥ ९॥✎ 1730 1731 1911

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1730 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-तत्त्वका → परमतत्त्वका
  • #1731 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वेदा-ध्ययनसे → वेदाध्ययनसे
  • #1911 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रवृति → प्रवृत्ति

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