श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्‍वर।

कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारितः॥ २८

avadhāritametanme yadāttha vibudheśvara|

kṛtaṃ vaḥ kāryamakhilaṃ bhūmerbhāro'vatāritaḥ|| 28

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्माजी! आप जैसा कहते हैं, मैं पहलेसे ही वैसा निश्‍चय कर चुका हूँ। मैंने आपलोगोंका सब काम पूरा करके पृथ्वीका भार उतार दिया॥ २८॥ परन्तु अभी एक काम बाकी है; वह यह कि यदुवंशी बल-विक्रम, वीरता-शूरता और धन-सम्पत्तिसे उन्मत्त हो रहे हैं। ये सारी पृथ्वीको ग्रस लेनेपर तुले हुए हैं। इन्हें मैंने ठीक वैसे ही रोक रखा है, जैसे समुद्रको उसके तटकी भूमि॥ २९॥ यदि मैं घमंडी और उच्छृंखल यदुवंशियोंका यह विशाल वंश नष्ट किये बिना ही चला जाऊँगा तो ये सब मर्यादाका उल्लंघन करके सारे लोकोंका संहार कर डालेंगे॥ ३०॥ निष्पाप ब्रह्माजी! अब ब्राह्मणोंके शापसे इस वंशका नाश प्रारम्भ हो चुका है। इसका अन्त हो जानेपर मैं आपके धाममें होकर जाऊँगा॥ ३१॥

यह व्याख्या श्लोक 11.6.28 से 11.6.31 तककी एक साथ है।

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