निष्पाप ब्रह्माजी! अब ब्राह्मणोंके शापसे इस वंशका नाश प्रारम्भ हो चुका है। इसका अन्त हो जानेपर मैं आपके धाममें होकर जाऊँगा॥ ३१॥
इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापतः।
यास्यामि भवनं ब्रह्मन्नेतदन्ते तवानघ॥ ३१
निष्पाप ब्रह्माजी! अब ब्राह्मणोंके शापसे इस वंशका नाश प्रारम्भ हो चुका है। इसका अन्त हो जानेपर मैं आपके धाममें होकर जाऊँगा॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.6.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 749) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/6/31/