श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

इदानीं नाश आरब्धः कुलस्य द्विजशापतः।

यास्यामि भवनं ब्रह्मन्‍नेतदन्ते तवानघ॥ ३१

idānīṃ nāśa ārabdhaḥ kulasya dvijaśāpataḥ|

yāsyāmi bhavanaṃ brahmannetadante tavānagha|| 31

अर्थ

निष्पाप ब्रह्माजी! अब ब्राह्मणोंके शापसे इस वंशका नाश प्रारम्भ हो चुका है। इसका अन्त हो जानेपर मैं आपके धाममें होकर जाऊँगा॥ ३१॥

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