श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै।

वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम्॥ ३८

teṣu dānāni pātreṣu śraddhayoptvā mahānti vai|

vṛjināni tariṣyāmo dānairnaubhirivārṇavam|| 38

अर्थ

हमलोग भी प्रभासक्षेत्रमें चलकर स्नान करेंगे, देवता एवं पितरोंका तर्पण करेंगे और साथ ही अनेकों गुणवाले पकवान तैयार करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करायेंगे। वहाँ हमलोग उन सत्पात्र ब्राह्मणोंको पूरी श्रद्धासे बड़ी-बड़ी दान-दक्षिणा देंगे और इस प्रकार उनके द्वारा अपने बड़े-बड़े संकटोंको वैसे ही पार कर जायँगे, जैसे कोई जहाजके द्वारा समुद्र पार कर जाय!॥ ३७-३८॥

यह अर्थ श्लोक 37–38 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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