॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.6.44
तव विक्रीडितं कृष्ण नृणां परममंगलम्।✎ 1215
कर्णपीयूषमास्वाद्य त्यजत्यन्यस्पृहां जनः॥ ४४
tava vikrīḍitaṃ kṛṣṇa nṛṇāṃ paramamaṃgalam|
karṇapīyūṣamāsvādya tyajatyanyaspṛhāṃ janaḥ|| 44
अर्थ
प्यारे कृष्ण! आपकी एक-एक लीला मनुष्योंके लिये परम मंगलमयी और कानोंके लिये अमृतस्वरूप है। जिसे एक बार उस रसका चसका लग जाता है, उसके मनमें फिर किसी दूसरी वस्तुके लिये लालसा ही नहीं रह जाती। प्रभो! हम तो उठते-बैठते, सोते-जागते, घूमते-फिरते आपके साथ रहे हैं, हमने आपके साथ स्नान किया, खेल खेले, भोजन किया; कहाँतक गिनावें, हमारी एक-एक चेष्टा आपके साथ होती रही। आप हमारे प्रियतम हैं; और तो क्या, आप हमारे आत्मा ही हैं। ऐसी स्थितिमें हम आपके प्रेमी भक्त आपको कैसे छोड़ सकते हैं?॥ ४४-४५॥