॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.7.15
त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभिः।
सुतरां त्वयि सर्वात्मन्नभक्तैरिति मे मतिः॥ १५
tyāgo'yaṃ duṣkaro bhūman kāmānāṃ viṣayātmabhiḥ|
sutarāṃ tvayi sarvātmannabhaktairiti me matiḥ|| 15
अर्थ
परन्तु अनन्त! जो लोग विषयोंके चिन्तन और सेवनमें घुल-मिल गये हैं, विषयात्मा हो गये हैं, उनके लिये विषय-भोगों और कामनाओंका त्याग अत्यन्त कठिन है। सर्वस्वरूप! उनमें भी जो लोग आपसे विमुख हैं, उनके लिये तो इस प्रकारका त्याग सर्वथा असम्भव ही है ऐसा मेरा निश्चय है॥ १५॥