॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.7.18
तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं
सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम्।
निर्विण्णधीरहमु ह वृजिनाभितप्तो
नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये॥ १८
tasmād bhavantamanavadyamanantapāraṃ
sarvajñamīśvaramakuṇṭhavikuṇṭhadhiṣṇyam|
nirviṇṇadhīrahamu ha vṛjinābhitapto
nārāyaṇaṃ narasakhaṃ śaraṇaṃ prapadye|| 18
अर्थ
भगवन्! इसीसे चारों ओरसे दुःखोंकी दावाग्निसे जलकर और विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष देश-कालसे अपरिच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठलोकके निवासी एवं नरके नित्य सखा नारायण हैं। (अतः आप ही मुझे उपदेश कीजिये)॥ १८॥