॥ श्रीहरिः ॥
पुरुषत्वे च मां धीराः सांख्ययोगविशारदाः।
आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम्॥ २१
puruṣatve ca māṃ dhīrāḥ sāṃkhyayogaviśāradāḥ|
āvistarāṃ prapaśyanti sarvaśaktyupabṛṃhitam|| 21
अर्थ
सांख्य-योगविशारद धीर पुरुष इस मनुष्ययोनिमें इन्द्रियशक्ति, मनःशक्ति आदिके आश्रयभूत मुझ आत्मतत्त्वको पूर्णतः प्रकटरूपसे साक्षात्कार कर लेते हैं॥ २१॥
पुरुषत्वे च मां धीराः सांख्ययोगविशारदाः।
आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम्॥ २१
सांख्य-योगविशारद धीर पुरुष इस मनुष्ययोनिमें इन्द्रियशक्ति, मनःशक्ति आदिके आश्रयभूत मुझ आत्मतत्त्वको पूर्णतः प्रकटरूपसे साक्षात्कार कर लेते हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 754) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/21/